आजादी का अमृत महोत्सव : ‘रहा’ की राह पर गोपीनाथ बोरदोलोई की बातें.. चप्पे-चप्पे में आज भी बसी हैं यादें
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
यहां की नदियां भी गुनगुनाती हैं गोपीनाथ बोरदोलोई की लोकप्रियता के गीत रहा... बरसों पहले इसी कस्बे से फूटी थी असम के विकास की राह। जननायक गोपीनाथ बोरदोलोई की अंगुली पकड़कर असम ने आधुनिकता की दहलीज पर कदम रखा। आधुनिक असम का रहगुजर एक छोटा सा कस्बा-रहा। गुवाहाटी से करीब 100 किमी दूर इसी जगह राज्य के महानायक गोपीनाथ बोरदोलोई का जन्म हुआ, बचपन बीता। भारत रत्न बोरदोलोई अब इस कस्बे के पर्याय बन चुके हैं। यहां का चप्पा-चप्पा आज भी उनकी ही बातें करता नजर आता है।
अगर किताबें और दस्तावेज बोरदोलोई के बारे में जानने-समझने की आपकी भूख नहीं मिटा पाते तो आपको पहले गुवाहाटी और फिर रहा तक का सफर तय करना होगा। गुवाहाटी से पूरब की ओर एक सड़क रहा तक जाती है। पूरी तरह हरियाली से आच्छादित सुंदर सा रहा कस्बा राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़ा है। गुवाहाटी से निकलने पर सड़क के एक तरफ कुछ दूर तक असम का इलाका है तो दूसरी तरफ मेघालय है।
नौगांव की ओर जाने वाली सड़क, जोरहाट, डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया होते हुए अरुणाचल तक जाती है। यह सड़क आपको उस दुनिया में ले जाएगी, जहां कण-कण में आज भी बोरदोलोई बसे हैं। तो चलें उस सफर पर....। उनकी जन्मस्थली के दर्शन को लेकर मन उत्साह से लबरेज था। रहा जाने के लिए गुवाहाटी पहुंचते ही पहला सुखद अहसास एयरपोर्ट पर ही हुआ, यह देखकर कि यहां का अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट उन्हीं गोपीनाथ बोरदोलोई के नाम पर है।
गुवाहाटी से करीब 100 किमी दूर है रहा कस्बा। 6 जून 1890 को पैदा हुए बोरदोलोई का बचपन यहीं बीता। रहा के आसपास दो नदियां हैं...कोलोंग और कोपिली। ये दोनों नदियां कई कहानियां सुनाती हैं। उनमें कुछ कहानियां भारत रत्न बोरदोलोई की भी हैं। बोरदोलोई की कहानियां सिर्फ इन दो नदियों की धाराओं के साथ नहीं बहतीं। उनसे जुड़ीं कहानियां इस पूरे इलाके में झरने की तरह बहती रहती हैं।
कभी रिमझिम, कभी तेज बारिश के बीच पता ही नहीं चला कि कब गुवाहाटी से रहा पहुंच गए। गुवाहाटी से रहा तक के सफर में ही उस नायक की अब तक अनसुनी कई कहानियां भी मुझ तक पहुंच गईं। आखिर यूं ही, इस इलाके के जर्रे-जर्रे में नहीं बसे हुए हैं, बोरदोलोई।
छोटे से घर में देखा बड़ा सपना
रहा बाजार से निकलते ही वह मकान है, जहां कभी बोरदोलोई रहते थे। इसी घर में उन्होंने देश को आजाद कराने और असम को तराश कर बेहतर बनाने का सपना देखा था। अब भी यहां कोने-कोने में उनकी ही यादें हैं। इन यादों को बड़े जतन से सहेजा भी गया है। उनके छोटे से आवास को असम सरकार ने संग्रहालय का रूप दे दिया है।
छोटा सा यह मकान काफी पुराना है। लेकिन बेहतर देखरेख की वजह से हालत अच्छी है। संग्रहालय परिसर में ही आधुनिक असम के निर्माता बोरदोलोई की प्रतिमा है। एक छोटे से हॉल में बोरदोलोई की निजी वस्तुएं प्रदर्शित हैं। कपड़े, स्याही-पेन, हाथ घड़ी आदि। साथ ही, महात्मा गांधी सहित अन्य समकालीन नेताओं की ओर से बोरदोलोई के नाम लिखे पत्र और अवसर विशेष की ऐतिहासिक तस्वीरें भी हैं।
तस्वीरें देश की आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को बखूबी बताती हैं। जगह कम होने के कारण यहां बोरदोलोई से जुड़ी कम ही चीजें प्रदर्शित की गई हैं। कई अन्य महत्वपूर्ण यादगार चीजें गुवाहाटी के संग्रहालय में हैं। फिर भी यहां इस महान नायक के जीवन से जुड़ी किताबों की कमी खलती है। ऐसी पुस्तकें रखी जाएं तो नई पीढ़ी उनके बारे में और ज्यादा जान सकेगी। इस संग्रहालय की देखभाल करने वाली रीता बरुआ बताती हैं कि बोरदोलोई की हर जयंती और पुण्यतिथि पर यहां कार्यक्रम होते हैं।
बोरदोलोई के निधन को 71 वर्ष हो चुके हैं। मगर स्थानीय लोगों के दिलों में अपने कामों के चलते वे आज भी जिंदा हैं। बात चलते ही स्थानीय लोग बताते हैं कि कम समय में ही बोरदोलोई ने असम के लिए क्या-क्या किया और कब किया। आखिर यूं ही उन्हें आधुनिक असम का निर्माता नहीं कहा गया।
जनसेवा सर्वोपरि, 20 घंटे तक करते थे काम
गोपीनाथ बोरदोलाई की पौत्री अशिमा बोरदोलोई से गुवाहाटी के गोपीनाथ भवन में मुलाकात हुई। गोपीनाथ बोरदोलोई होने का असल मतलब अशिमा से मिलकर समझ में आता है। उनके पिता रोबिन बारदोलोई असम सरकार में मंत्री रहे हैं। अस्सी वर्षीय रोबिन के अस्वस्थ होने और कोरोना काल के चलते मुलाकात संभव नहीं हो सकी। सैंतालीस वर्षीय अशिमा लंबे समय तक दादीजी के साथ रही थीं।
इसलिए उनके पास सुनाने को दादाजी के कई किस्से हैं। दादाजी को याद कर कई बार भावुक हुईं अशिमा बताती हैं- वह कहा करते थे, मेरा पहला काम जनता की सेवा है, बाद में अपना स्वास्थ्य। जनता ने मुझे काम के लिए चुना है। यह सब बताते हुए उनकी आंखों में चमक दिखती है। वे बताती हैं कि दादाजी रोजाना 18 से 20 घंटे काम करते थे। अपनी बीमारी के दिनों में भी आराम नहीं किया।
असम को पूर्वी पाकिस्तान और चीन से बचाकर भारत का हिस्सा बनाना उनका सबसे बड़ा काम था। इस मुद्दे पर वे जवाहरलाल नेहरू के भी खिलाफ गए। उन्हें महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस का भरपूर सहयोग मिला। इन दोनों के साथ की उनकी तस्वीरें उन्होंने संभाल कर रखी हैं। वह कहती हैं कि सरकार को विश्वविद्यालय में उनके नाम पर चेयर बनाने के साथ ही स्कूली पाठ्यक्रम में उनके बारे में पाठ को शामिल करना चाहिए। हालांकि वे सरकारी स्तर पर बारदोलोई के सम्मान में किए गए कार्यों से संतुष्ट नजर आईं।
सबसे बड़ी बात है कि महात्मा गांधी उन्हें बहुत प्यार करते थे। उनकी बात सुनी भी जाती थी। वास्तव में गोपीनाथ जी बड़े देशभक्त थे। उन्होंने अपना जीवन देश को दिया। आज अगर असम भारत का अभिन्न अंग है, तो इसमें लोकप्रिय गोपीनाथ का बहुत बड़ा योगदान है।
...तो भारत नहीं, पाकिस्तान का हिस्सा होता असम
आज उन्हें याद करते हुए, मन भावुक होता है। अगर वे समय पर निर्णय नहीं लेते तो शायद असम भारत का हिस्सा नहीं होता। किसका हिस्सा होता, यह जगजाहिर है। उस दौरान जो बातें हम सुनते थे, उसके मुताबिक जिन्ना ने तो इसे पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बनाने का पूरा मन बना लिया था। लेकिन लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अड़ गए। कहते हुए गहरी सोच में चले जाते हैं, जगदीश चंद्र चौधरी।
डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट पद से रिटायर और फिलहाल गुवाहाटी हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले चौधरी बीते समय को याद करते हुए कहते हैं, हालात बहुत ही नाजुक हो गए थे। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। गोपीनाथ जी पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। सभी उनकी ओर देख रहे थे। वे केंद्रीय नेतृत्व के साथ लगातार बातचीत करते रहे। तब जाकर असम बच पाया।
मंझे हुए वकील भी थे बोरदोलोई
जगदीश चंद्र चौधरी बताते हैं कि बोरदोलोई अच्छे राजनेता, प्रधानाध्यापक के साथ मंझे हुए वकील थे। बोरदोलोई गुवाहाटी लॉयर एसोसिएशन के सदस्य थे। बताते हैं कि अपने समय में वकालत में काफी सक्रिय थे। 1948 में गुवाहाटी हाईकोर्ट की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।